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किसान कर्जमाफी के ढर्रे पर नया चुनावी स्टंट बनने जा रहा है बेरोजगारी भत्ता

Date : 2018-11-29 01:07:00 PM

नई दिल्ली-(29-11-2018)-किसानों की कर्जमाफी राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्रों का एक प्रमुख अजेंडा हुआ करती है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी किसानों का कर्ज माफ नहीं करने का हवाला देकर मोदी सरकार को किसान विरोधी बताते रहते हैं। इसी क्रम में बेरोजगार युवाओं की बढ़ती आबादी भी राजनीतिक दलों के लिए सरदर्द साबित हो रही है। इसलिए, किसान कर्जमाफी के ढर्रे पर ही अब बेरोजगारी भत्ते का भी चुनावी वादा होने लगा है। राजस्थान में बीजेपी ने सत्ता में वापस आने पर 21 वर्ष से ऊपर के शिक्षित बेरोजगारों को 5 हजार रुपये प्रति माह बेरोजगारी भत्ता देने का वादा किया है। वहीं, कांग्रेस पार्टी ने भी तेलंगाना के चुनाव में 3 हजार रुपये प्रति माह के बेरोजगारी भत्ते का चुनावी वादा किया है। इधर, समाजवादी पार्टी ने भी मध्य प्रदेश के युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देने का ऐलान किया। उधर, आंध्र प्रदेश में अगले वर्ष होने वाले चुनाव को लेकर चंद्रबाबू नायडू ने 'युवा नेस्तम' योजना के तहत शिक्षित बेरोजगारों को 1 हजार रुपये प्रति माह देने का ऐलान किया है। दरअसल, जिस तरह सिंचाई के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करने और किसानों को अपने उत्पाद बेचने के लिए मंडियों को सुलभ बनाने में गंभीर योजना और लंबे वक्त की जरूरत होती है, उसी तरह युवाओं को रोजगार पाने योग्य कौशल प्रदान करनेऔर उनके लिए पर्याप्त रोजगार पैदा करने में भी दूरदृष्टि के साथ-साथ दृढ़ इच्छा शक्ति की दरकार होती है। कोई भी राजनीतिक दल इतना तनाव लेने की जहमत नहीं उठाना चाहता, इसलिए किसानों और युवाओं को लुभाने के लिए कर्जमाफी और बेरोजगारी भत्ते जैसा फौरी आकर्षण का जाल फेंका जाता है। चूंकि, किसानों और युवाओं की आबादी इतनी बड़ी है कि कोई राजनीतिक पार्टी इसे नजरअंदाज करके सत्ता पा नहीं सकती। 


ताजा आंकड़े के मुताबिक, देश में अभी 3 करोड़ से ज्यादा युवा बेरोजगार हैं और इनकी संख्या में साल-दर-साल इजाफा होता जा रहा है। इसलिए, किसानों की तरह अब युवा भी राजनीतिक दलों के निशाने पर हैं। दरअसल, कहा यह जाता है कि युवाओं के अपार समर्थन की वजह से ही 2014 में मोदी लहर पैदा हुई थी। तो क्या कर्जमाफी और बेरोजगारी भत्ता के वादे पूरा करना आसान है? दरअसल, ज्यादातर राज्यों के पास इतना फंड नहीं है कि युवाओं को बेरोजगारी भत्ता दिए जा सके, लेकिन किसान कर्जमाफी की तरह ही इसका भी आर्थिक पक्ष के मुकाबले राजनीतिक महत्व बड़ा है। राजनीतिक दल के लिए युवाओं की भलाई से ज्यादा सत्ता प्राप्त करना ज्यादा मायने रखता है। इसलिए, बेरोजगारी भत्ता प्राप्त करने की शर्तें ऐसी रखी जाती हैं, जिनमें बेरोजगार युवाओं का बहुत छोटा हिस्सा इनके दायरे में आ पाता है। मसलन, आंध्र प्रदेश में महज 12 लाख युवाओं के लाभ पा सकने का दावा किया जा रहा है। बेरोजगारी भत्ता प्राप्त करने के लिए राज्य का निवासी होना, उम्र की सीमा (कहीं 18 से 35 वर्ष तो कहीं 21 से 35 वर्ष), रोजगार केंद्रों में पंजीकरण, पारिवारिक आय (कहीं-कहीं सिर्फ गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों तक सीमित), माता-पिता पर पूरी निर्भरता जैसी शर्तें रखी जाती हैं। इससे बड़ी तादाद में बेरोजगार युवा इस दायरे में आने से वंचित रह जाते हैं। दरअसल, केंद्र सरकार ने रोजगार नहीं पा सकने वालों को रूरल जॉब गारंटी स्कीम के तहत बेरोजगारी भत्ता देने का प्रावधान कर रखा है, लेकिन इस योजना का लाभ शायद ही किसी को दिया जाता है। कई राज्य तो ऐसे बेरोजगारों का आंकड़ा भी जुटाने की जहमत नहीं करती। इसी तरह, छत्तीसगढ़, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, केरल, पंजाब, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे कुछ राज्यों में बेरोजगारों को भत्ता देने की योजना है, लेकिन अब नई बात यह हो रही है कि अब कुछ सौ की जगह कुछ हजार रुपये का भत्ता देने का ऐलान हो रहा है।