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कहीं खालिस्तान जैसी साजिश की शुरुआत तो नहीं ?

Date : 2018-11-19 11:36:00 AM

अमृतसर-(रवि गिल,साहिल मल्होत्रा)-अमृतसर में निरंकारी सत्संग पर हुए ग्रेनेड अटैक ने न केवल पंजाब सूबे को हिला दिया है बल्कि कुछ बड़ी आशंकाएं भी खड़ी हो गई हैं। रविवार को धार्मिक डेरे के कार्यक्रम में हुए इस हमले ने 1980 के दशक की उस पंजाब की याद दिला दी है जब निरंकारियों व सिखों के बीच हिंसा ने खालिस्तान मूवमेंट को रौद्र रूप दिया और पंजाब में आतंकवाद चरम पर पहुंच गया। हालांकि इस हमले में अलकायदा और आईएसआई कनेक्शन की आशंकाओं की भी पड़ताल की जा रही है। फिलहाल राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने इस मामले की जांच अपने हाथों में ले ली है। निरंकारी समागम पर हुए हमले की फिलहाल कई थिअरी चर्चा में हैं। एक थिअरी सिख धर्म के आंतरिक संघर्ष की भी है, जिसने 1980 के दशक में पंजाब को आतंकवाद की आग में झोकने का काम किया था। 


इस पूरे मामले को समझने के लिए पहले आपको सिख-निरंकारी विवाद के बारे में जानना होगा। 
दरअसल निरंकारी मिशन की शुरुआत सिख धर्म के भीतर ही एक पंथ के रूप में हुई थी। 1929 में पेशावर (अब पाकिस्तान में) में बूटा सिंह ने निरंकारी मिशन की शुरुआत की थी। निरंकारियों ने सिखों के गुरुग्रंथ साहिब को गुरु मानने की पंरपरा का बहिष्कार करते हुए जीवित गुरु को मानने की बात कही। बंटवारे के बाद दिल्ली में निरंकारियों का मुख्यालय बना। बूटा सिंह, अवतार सिंह, बाबा गुरबचन सिंह, बाबा हरदेव सिंह, माता सविंदर हरदेव और माता सुदीक्षा निरंकारियों के 6 गुरु हुए। फिलहाल माता सुदीक्षा ही निरंकारियों की गुरु हैं। सिखों ने निरंकारी गुरु अवतार सिंह द्वारा रचित अवतारवाणी और युग पुरुष जैसी रचनाओं पर सिख धर्म और सिख गुरुओं की आलोचना का आरोप लगाया। सिखों और निरंकारियों के बीच का यही विवाद आगे चलकर हिंसक हो गया। 1980 के दशक में ही पंजाब में आतंकवाद के प्रमुख चेहरे जरनैल सिंह भिंडरावाले का भी उदय हो रहा था। भिंडरावाले की पहचान सिख कट्टरपंथी के रूप में बन रही थी और उसने निरंकारियों का खूब विरोध किया। 13 अप्रैल 1978 को अमृतसर में ही निरंकारी मिशन के एक कार्यक्रम के दौरान निरंकारियों और सिखों के बीच हिंसक संघर्ष में 16 लोग (3 निरंकारी, 13 सिख) मारे गए। इस घटना के बाद अकाल तख्त ने हुकमनामा जारी कर निरंकारियों को सिख धर्म से बाहर कर दिया, लेकिन हिंसा का यह दौर यहीं नहीं थमा। इस बीच सिखों ने प्रतिशोध लेने के लिए रणजीत सिंह नाम के एक कार्यकर्ता के नेतृत्व में 24 अप्रैल 1980 को निरंकारी गुरु गुरबचन सिंह की हत्या कर दी। इन दोनों हिंसाओं में आरोप भिंडारवाले पर लगे और उसके समर्थकों पर कई मुकदमे दर्ज हुए। इसके बाद पंजाब में आतंकवाद का खूनी दौर शुरू हो गया। 

निरंकारी मिशन पर हुए हमले की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि पंजाब में आतंकवादियों के मूवमेंट को लेकर पहले से अलर्ट था। अलकायदा कमांडर जाकिर मूसा के पंजाब में देखे जाने की सूचना मिली थी। इससे पहले जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों के भी पंजाब में घुसने का अलर्ट जारी हुआ था। पिछले महीनों में पंजाब में संघ कार्यकर्ताओं की हत्या भी हुई थी। कुल मिलाकर देखा जाए तो पंजाब में हिंसा की घटनाएं बढ़ती नजर आ रही हैं। एनआईए अब हर ऐंगल से इस मामले की जांच कर रही है। हालांकि सिख और निरंकारियों के बीच हिंसक संघर्ष के दौर को खत्म हुए दशकों बीत चुके हैं। जांच एजेंसियों ने भी अबतक इस मामले में सिख और निरंकारी विवाद का कोई ऐंगल पेश नहीं किया है, लेकिन जिस तरह से धार्मिक समागम को निशाना बनाया गया है वह खुद में ही सवाल खड़े करता है।