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प्रदूषित हवा को सजा-ए-मौत की तरह बताया दिल्ली के डॉक्टरों ने

Date : 2018-11-05 05:30:00 PM

नई दिल्ली-(05-11-2018)-योगेश कुमार के रोगग्रस्त फेफड़े को सर्जरी करके हाल ही में निकाला गया है, लेकिन उनके सर्जनों को यह चिंता है कि वह अस्पताल के बाहर की हवा भी में आखिर कब तक टिक पाएंगे। हवा जो जिंदगी कही जाती है, लेकिन दिल्ली में हवा तो दुनिया में सबसे खराब में से एक हो चुकी है, जहर बन चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक भारत में स्मॉग से हर साल 10 लाख लोगों की मौत हो जाती है। दुनिया के बड़े शहरों में दिल्ली में हवा सबसे खराब है।2 करोड़ की आबादी वाला यह शहर पिछले कुछ सालों से हर नवंबर में स्मॉग की मोटी चादर में लिपट जाता है और अस्पतालों में सांस के मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल के थौरेसिस सर्जन श्रीनिवास के. गोपीनाथ, जिन्होंने 29 वर्षीय योगेश कुमार की सर्जरी की थी, कहते हैं, 'दिल्ली की हवा उसके (कुमार) लिए सजा-ए-मौत की तरह है।' गोपीनाथ को डर है कि खतरनाक टीबी से बचा उनका मरीज अब एक अन्य अदृश्य हत्यारे की दया पर निर्भर है।ठंडी हवा की वजह से हवा में प्रदूषक तत्व जमीन के नजदीक मंडराने लगते हैं।

 दिल्ली की हवा में PM 2.5 का स्तर काफी खतरनाक है। ये कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि आसानी से फेफड़ों और खून में समा सकते हैं। दिल्ली में PM 2.5 का स्तर अक्सर सुरक्षित सीमा से 30 गुना ज्यादा तक पहुंच जाता है। दिवाली की तैयारियां जोरों पर हैं लेकिन दिल्ली की हवा के लिए यह वक्त सबसे खतरनाक होता है। दिवाली पर फोड़े जाने वाले लाखों-करोड़ों पटाखों से निकला धुआं कारों व फैक्ट्रियों के उत्सर्जन, निर्माण की वजह से निकले धूलकणों और पराली के जलाने से निकले धुएं से मिलकर हवा को बेहद जहरीला और खतरनाक बना देता है। इससे हवा में प्रदूषण की मात्रा इतनी ज्यादा बढ़ जाती है कि वैज्ञानिक उपकरण भी इसे मापने में फेल हो जाते हैं। कुमार को बुधवार को दिवाली के ही दिन अस्पताल से डिस्चार्ज किया जाना है। डॉक्टर गोपीनाथ कहते हैं, 'अस्पताल के अंदर हवा की गुणवत्ता सही है, लेकिन जैसी ही वह बाहर कदम रखेगा, जहरीली हवा उसे प्रभावित करना शुरू कर देगी। उसकी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है। उसके पास अब सिर्फ एक फेफड़ा है जो उसके लिए वाकई कीमती है। यह सोचना ही डरावना है कि कोई सिर्फ एक फेफड़े से इस खतरनाक हवा में कैसे सांस ले पाएगा?' योगेश कुमार इकलौते ऐसे नहीं हैं, जिनके लिए दिल्ली की हवा सजा-ए-मौत की तरह है। बच्चे, बुजुर्ग खासकर वे जिन्हें दमा जैसी सांस से जुड़ी समस्याएं हैं, उनके लिए दिल्ली का स्मॉग बेहद खतरनाक है।

 इस स्मॉग से राहत फरवरी के आखिर में ही मिलती है। WHO ने अक्टूबर में अपनी रिपोर्ट में बताया कि खतरनाक हवा में सांस लेने की वजह से हर साल सैकड़ो हजार बच्चों की मौत हो जाती है। बच्चे वयस्कों के मुकाबले और तेजी से सांस लेते हैं। इस तरह वे अपने छोटे से शरीर में वयस्कों के मुकाबेल करीब दोगुनी प्रदूषित हवा को अंदर लेते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि दिल्ली में बच्चों पर प्रदूषित हवा का विनाशकारी असर पड़ता है। दिल्ली के जाने-माने लंग (फेफड़ा) सर्जन डॉक्टर अरविंद कुमार बताते हैं, 'दिल्ली में जन्मा बच्चा पहले ही दिन से जिस हवा में सांस लेता है, वह 20 से 25 सिगरेट पीने के बराबर हानिकारक है।' डॉक्टर अरविंद कुमार बताते हैं कि उनके पास जो मरीज आते हैं, उनमें उनकी भी अच्छी-खासी तादाद है, जिन्होंने जिंदगी में कभी धूम्रपान नहीं किया है। वह बताते हैं, 'इन लोगों ने कभी धूम्रपान नहीं किया, लेकिन इसके बाद भी उनके फेफड़े काले हो चुके हैं। यहां तक कि किशोरों के फेफड़ों पर भी काले धब्बे मिल रहे हैं। यह डरावना है।' हर साल सर्दियों में स्मॉग से लड़ने की सारी सरकारी कोशिशों का कोई खास असर नहीं दिख रहा है। निर्माण पर प्रतिबंध, ट्रैफिक कम करने और डीजल जेनरेटरों के इस्तेमाल पर रोक जैसे आपातकालीन प्रयासों का बहुत ही कम असर दिख रहा है।